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S S JHA
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S S JHA
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@ssj1967

CIVIL ENGG.

MOTIYA,GODDA(district)

calender Joined on Sep 2020
genderMale
heartMarried
degree
BtechJrn raj., 2012
degree
Assistant vice president projectsHighway construction, 1986-Present
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KooKoo 404
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@ssj1967

CIVIL ENGG.

पथराई आँखें आज तक निहारती उन्हीं पगडंडियों को आखिरी बार जिधर से तुम गुजरी थी रौंदकर मेरे अरमानों को भूलकर मेरे जज्बातों को क्या करूँ इस दिल का जो मानने से इनकार करता है तरु की वो छाया अब नहीं मेरी स्वीकार करता है किसी से दिल का लगाना शहद से भी मीठा होता है जब कोई ठुकरा दे वो बेमौत मार देता है जो हूक दिल में उठती है ता उम्र फिर नहीं निकलती है बेनूर आंखें फिर भी राह तकती हैं काश कोई लौट आए इसी रस्ते जिसे देख निगाहें नहीं थकती हैं .
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@ssj1967

CIVIL ENGG.

ले तेग बहादुर हाथों में मत सो घनेरी रातों में दुर्दिन के बादल छटे नहीं खुशियों के मेवे बटे नहीं फिर क्यों चादर तान लिया फिर क्यों ऑंखें ढाँप लिया सालों पहले भी तुम सोए थे भगवान भरोसे खोए थे परिणाम बहुत विकराल मिला टुकड़ों में तेरा भाल मिला तुम बटे रहे तुम लुट गए शीश शर्म से झुक गए अब तो जागो हुँकार लगाओ पुरुखों के कलंक मिटाओ ये धरती तेरी आसमान भी तेरा है मार कुंडली जो बैठा वो तो एक लुटेरा है मत सोचो कि फैला गहन अँधेरा है जब जागो तभी सवेरा है .
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@ssj1967

CIVIL ENGG.

गर्म आँसुओं के दो बूंद ढलक रहे हैं गालों पर आज की मदमाती फ़िजा भारी नहीं है दिल के छालों पर ना खुशी ना ही कोई गम है एक अधपकी अहसास किसी नश्तर से नहीं कम है इस वीराने से जुड़ती रही हैं कुछ खोए समय की जंजीरें जब भी आता हूँ इस वीराने में यादों के कुछ झोंकों को झोंकता हूँ खुद को रिझाने में लब तो मुस्कुराते हैं परंतु दो अश्क बहाता हूँ अनजाने में अबूझ सी पहेली है ये अब तो जिंदगी की सहेली है ये किसकी याद के हैं ये आँसू किस तस्वीर के हैं ये पिपासु .
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@ssj1967

CIVIL ENGG.

हर तरफ भीड़ से घिरा हूँ शानदार जीवन जी रहा हूँ जरुरत से अधिक ही मिल रहा है रेत के गमलों में भी फूल खिल रहा है क्षण भर को जब भीड़ से निकलता हूँ वीरान निगाहों से सुकून को ढूढ़ता हूँ सुनसान राह का पथिक न जाने कब इस राह पर बढ़ गया हरियाली में घूमनेवाला अट्टालिकाओं के जाल में घुस गया कमी कुछ भी नहीं कमियों के सिवा रोष कुछ भी नहीं रोशनी के सिवा रोशनी अभी भी जिन्दा है दिल के कोने में पैर जमीं पर ही रखा हूँ इंसान बने रहने में .
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10 May
@ssj1967

CIVIL ENGG.

मध्य निशा ऊंघती अनमनी सी जिंदगी की जद्दोजहद में जी रही कुछ जिंदगियाँ कहीं चैन की नींद सपनों की दुनिया कल की चिंता से मुक्त अधिकाधिक संग्रह की आकांक्षित वीरानियाँ विरोधाभास परिलक्षित ईश्वर मनु कृत्य से लज्जित अपेक्षित नहीं पशुवृति पर कौन तजे ये प्रवृतियाँ उर्ध्व गमन सुनिश्चित संपूर्ण संचय को छोड़कर फिर भी ललक जाती नहीं छोड़ नहीं पाता नादानियाँ राम राज्य कभी आएगा क्या सब पाकर सब छोड़ेगा क्या उम्मीद को क्यों छोड़ा जाये उम्मीद के सहारे ही जिया जाये .
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08 May
@ssj1967

CIVIL ENGG.

माँ पर लिखने को सोचता रहा पूरी रात जगता रहा यादों को समेटता सहेजता रहा लेखनी उठाकर जब लिखने लगा माँ इससे अधिक कुछ लिख ही नहीं पाया .
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07 May
@ssj1967

CIVIL ENGG.

घटा घनेरी अलकें तेरी कज्जर कारी दृग क्यारी काम कमान तिरछी भौहें चपला चंचल धवल मन मोहें रसिक रसाल होंठ गुलाली कुंडल कर्ण सुशोभित आली कंठ कपोत चित्तचोर चकोरी ह्रदय टीस चितवन झकोरी उर सरोज पुष्पित पल्लवित कटि पतंग निरखि मन हर्षित अजानु बाहु नख इंद्रधनुषी कुंदन चारु सुवासित वासी तरुणी हिरणी चाल सुहानी शत जनम निछावर रूप हिमानी प्रणम्य प्रेम आकांक्षी मन धरूँ बाँह प्रगाढ़ मिलन मन तन .
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06 May
@ssj1967

CIVIL ENGG.

सफ़ेद बादलों के टुकड़े सूखे सूखे से मंडरा रहे हैं हलकी हवा के झोंकों संग बेतरतीब छितरा रहे हैं जलहीन होकर भी इतरा रहे हैं अहं का वहम बहुत भारी होता है शनैः शनैः अस्तित्व को खोता है जिस हवा के कन्धों का सहारा लिया मगरूर होकर मचलता रहा वक्त क्या पलटा उन्हीं झोकों ने रेशा रेशा बिखेर दिया धरा पर खड़ा खुशफहमी में नहीं जीता सोने की कटोरी में हालाहल नहीं पीता मृदा पात्र का अमृत अमृत ही रहेगा काया के रोम रोम में बसेगा आभरण नहीं अंतरण की सोचो हकीकत से ऑंखें नहीं मीचो .
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03 May
@ssj1967

CIVIL ENGG.

याद आती हैं अब वो बातें तेरी एक झलक पाने को टूटी दीवार के पीछे सहमा डरा सा उत्कंठित खड़ा तेरे घर की खिड़कियों को निहारते याद आती हैं वो बातें बायीं तरफ दुपट्टे को लपेटते गर्दन को झटकना तिरछी निगाह से दीदार करना सहम कर फिर भाग जाना याद आती हैं वो बातें जब छुआ था पहली बार तुम्हें कांपते पैर बढ़ती धड़कनें किसी के आने का डर छुड़ाकर ऊँगली भागी थी तुम याद आती हैं वो बातें जब दीदार ही प्यार था वो प्यार भी अपरम्पार था सोचता ही रहा अपना लूँ पर खौफ था अनजाना बढ़ नहीं पाया और क्या बोलूं .
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02 May
@ssj1967

CIVIL ENGG.

आसमां खामोश है फ़िज़ा मदहोश है तुम साथ नहीं ,अफ़सोस है सतरंगी सपने देखे थे तुमने हमने यहीं इसी बियावान में उगती सुबह ढलती शाम में धोंकती मध्यान में मध्य रात्रि का पहर अधखुली आँखों का कहर बेनूर सी होती आशाएँ खिसियाती सी दिशाएँ साथ होना भी कब आसान था दूर होकर जीना भी कहाँ आसान है कोमल से दिल पे रखा अब पाषाण है नियति यही मान लिया मिलन असंभव जान लिया राहें अलग हुई दिल ने कब मान लिया हर रात सूजती हैं आंखें हर शाम मचलता है दिल रूबरू ना सही ख्वाबों में तो आके मिल .
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