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Hemant Priyadarshi

@hemant_36

Teacher | writer | Spiritual Thinker |

koo-captain | vokal-expert

calender June 2020 में कू पर आए।

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मेंशन्स
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Teacher | writer | Spiritual Thinker |
धर्म के नाम पर सारे प्रपंच व्यर्थ हैं। न कोई धर्म का तीर्थ है, न मंदिर है, न किताबें हैं, न कोई धर्मगुरु है। जब तक इन सबमें भटके रहेंगे, धर्म को नहीं जान सकते। आप कहेंगे, फिर क्या करें ? गुरु के पीछे न जाएं, तो कहां जाएं ? किसी के पीछे मत जाओ ! ठहर जाओ ! वहां पहुंच जाएंगे, जहां पहुंचना जरूरी है। कुछ चीजें हैं, जहां चलकर पहुंचा जाता है और कुछ हैं, जहाँ ठहरकर ही पहुंचा जाता है. धर्म ऐसा ही है.
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🌼🏵🌷 आपको इस अद्भुद सत्य का पता भी ना होगा, और बोध तो बिल्कुल भी नहीं कि - "हमें छह महीने पहले मृत्यु का बोध हो जाता है, और जन्म के छह महीने तक पूर्वजन्म का बोध रहता है"।  इस बीच का "गहनतम स्वप्नमय अंतराल" ही "स्वर्ग और नर्क" है।  और शायद इसलिए ही सभी धर्मों ने सोने के  एक घंटे पहले और उठने के एक घंटे बाद ही प्रार्थना का समय तय किया है। यही साधना काल है।  यही संध्या काल है। – ओशो 🏵🌹🏵
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आदमी पूर्णतः इसलिए रुग्ण हो गया है, क्योंकि जब हम प्रभु की तलाश में भी जाते हैं, तो एक मकान को छोड़ कर दूसरे मकान में घुस जाते हैं. उन मकानों का नाम मंदिर है, मस्जिद है, चर्च है। इतना विराट मंदिर है चारों ओर, उसके निकट जाने का कोई ख्याल नहीं. यह सुन्दर अलौकिक प्रकृति नहीं दिखती. प्रकृति से प्रेम नहीं है , और ईश्वर से प्रेम होने का, उसे जानने का ढोंग करते हैं ! और समझते हैं कि हम बड़े धार्मिक हैं !
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स्वर्ग का अर्थ होता है:- जहां सुख है, भरपूर सुख है। जैसा हम चाहते हैं वैसा है। हमारी चाह का परिपूरक है। हमारी चाह को भरता है। हमारी चाहत के अनुकूल जहां सब हो, वहां स्वर्ग है। तो जहां हमारी चाह पूरी होती है वहां क्षणभर में भी स्वर्ग में हो जाते हैं। नर्क का अर्थ है:- जहां सब हमारी चाह के विपरीत हो रहा है. जो हम चाहते हैं, ठीक उससे उलटा हो रहा है. दुःखमय ! और कोई स्वर्ग-नर्क नहीं. और सब यहीं है
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महावीर चमत्कार को नहीं मानते। कोई भी वैज्ञानिक बुद्धि का व्यक्ति नहीं मानता। चमत्कार कहीं न कहीं धोखा होगा, क्योंकि नियमों का कोई अपवाद नहीं होता। अगर कोई आदमी हाथ से राख निकाल देता है तो कहीं न कहीं कोई मदारीगिरी होगी, क्योंकि जीवन के नियम किसी का अपवाद नहीं मानते। जीवन के नियम व्यक्तियों की चिंता नहीं करते ! निर्वैयक्तिक होते हैं, सार्वभौम होते हैं। उनसे अन्यथा होने का उपाय नहीं।
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महावीर धर्म की परिभाषा करते हैं: - जीवन के स्वभाव सूत्र को समझ लेना ही धर्म है। जीवन के स्वभाव को पहचान लेना धर्म है। स्वभाव ही धर्म है। उनके वचन हैं :- मग्गो मग्गफलं ति य द्रविहं जिणसासणे समक्खादं। मग्गो खलु सम्मतं  मग्गफलं होइ निव्वाणं।। मार्ग है - मोक्ष का उपाय और फल है - निर्वाण। मार्ग और मार्ग-फल! महावीर के वचन दो शब्दों में जीवन के धर्म की सम्पूर्ण व्याख्या करते हैं.
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अगर सौ डिग्री गर्म करने से पानी भाप बन जाता है तो फिर पानी को भाप बनाने के लिए किसी परमात्मा की जरूरत नहीं है। और किसी की प्रार्थना भी व्यर्थ है। इस नियम को जिसने जान लिया, वह अगर पानी को भाप बनाना चाहेगा तो बना लेगा। विज्ञान के हिसाब से परमात्मा हमारे अज्ञान का हिस्सा है। क्योंकि हम जानते नहीं जीवन के नियम को, इसलिए हम परमात्मा का नाम लेते हैं। जब कहते हैं - "परमात्मा जाने' तो मतलब हम नहीं जानते.
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विज्ञान के लिए परमात्मा की कोई जरूरत नहीं है. प्रकृति के नियम काफी हैं. पर्याप्त हैं.परमात्मा की जरुरत नहीं. विज्ञान की मूलभूत धारणा है - "न्यूनतम सिद्धांत"। जितने कम सिद्धांतों से काम चल सके, उतना उचित ! चेष्टा तो विज्ञान की यह है कि अंततः एक ही सिद्धांत मिल जाये जिससे जीवन की सारी पहेली सुलझ सके। इसलिए गैर-अनिवार्य को बिलकुल जगह नहीं देना है। विज्ञान निरंतर सबसे स्माल पार्टिकल की खोज कर रहा !
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🌱🌱🌱🌾🌾🌿🌿🌾🌾🌱🌱🌱 रखेंगे अगर हम ख्याल उनका तो वो भी हमारा ख्याल रखेंगे ! पॉलिथीन की जगह झोला टिसू पेपर की जगह रुमाल रखेंगे ! एक पौधा लगाओ, उसको सम्भालो य़कीनन वो पर्यावरण को सम्भाल रखेंगे ! 🌾🌾🌱🌷शुभ प्रभात मित्रों🌷🌱🌾🌾
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धर्म और विज्ञान एक अर्थ में समान हैं. कि दोनों प्रयोग में विश्वास करते हैं। निःसंदेह धर्म का प्रयोग विज्ञान के प्रयोग से गहरा है, क्योंकि विज्ञान के प्रयोग में प्रयोगकर्ता स्वयं संलग्न नहीं होता। वह उपकरणों के द्वारा पदार्थ के साथ काम करता है। वह स्वयं प्रयोग से बाहर रहता है। धर्म ज्यादा गहन है, उसमें प्रयोगकर्ता स्वयं प्रयोग बन जाता है। कोई उपकरण नहीं ! स्वयमसाध्य ! स्वयंसाधक ! स्वयंसाधन !
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