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कन्हैयालाल

@88kanhaiyalal

Business Owner

सनातन धर्मी।3

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calender Sep 2020 में कू पर आए।

कू (1789)
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रिकू और कमेंट
मेंशन्स
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दुनिया में वही शख़्स है ताज़ीम के क़ाबिल जिस शख़्स ने हालात का रुख़ मोड़ दिया हो ~अज्ञात
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धारणा है तुम्हारी कि स्त्री होने की अपनी एक मर्यादा होती है अपनी एक सीमा होती है स्त्रियों की सहनशक्ति होनी चाहिए उसमें मीठा बोलना चाहिए लाख कडुवाहट के बावजूद पर यह कैसे संभव है कि हम तुम्हारे बने बनाए फ्रेम में जड़ जाएँ ढल जाएँ मनमाफिक तुम्हारे सांचे में..... #निर्मला_पुतुल #जन्मदिन🎂💐
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क्या तुम जानते हो पुरुष से भिन्न एक स्त्री का एकांत घर-प्रेम और जाति से अलग एक स्त्री को उसकी अपनी ज़मीन के बारे में बता सकते हो तुम । बता सकते हो सदियों से अपना घर तलाशती एक बेचैन स्त्री को उसके घर का पता ।... #निर्मला_पुतुल #जन्मदिन🎂💐
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🙏💐💐🙏 श्रमिक का पसीना हो कि लोहू देश-दुश्मन का फैला सहस्र जीभ चाटती है लेखनी राष्ट्र के विरूद्ध युद्ध धरती का वक्ष क्रुद्ध शत्रुओं के मुण्डों से पाटती है लेखनी नेता,अभिनेता या द्यूत का विजेता हो सब की नकाबों को उलट देती लेखनी जन - क्रांतियाँ लाती, सभी भ्रन्तियाँ मिटाती है देश का ललाट - लेख पलट देती लेखनी... #विमल_राजस्थानी #पुण्यतिथि🙏
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💐 प्यार की झील की ये जो गहराइयाँ जानें क्या जो किनारों पै ठहरे हुए धड़कनें दो दिलों की न सुन पायेंगे हो जो जज्बात से दूर, बहरे हुए इश्क करना अगर भूल दुनिया कहे भूल यह मैं दुबारा-तिबारा करूँ तुमको इस नाम से याकि उस नाम से बोलो किस नाम से मैं पुकारा करूँ चाहता हूँ-न बाधा बनें ये पलक एकटक बस तुम्हें मैं निहारा करूँ। #विमल_राजस्थानी #पुण्यतिथि🙏
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🥀🌱🥀🌱🥀🌱🥀🌱🥀 पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी॥ पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई॥ पुत्रियों को पहुँचाती हैं, फिर लौटकर मिलती हैं। परस्पर में कुछ थोड़ी प्रीति नहीं बढ़ी (अर्थात बहुत प्रीति बढ़ी)। बार-बार मिलती हुई माताओं को सखियों ने अलग कर दिया। जैसे हाल की ब्यायी हुई गाय को कोई उसके बालक बछड़े (या बछिया) से अलग कर दे। #india #‌koo #jaishreeram
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वक्त के थपेड़े पड़ने पर जिस पिता की छाँव में रहा जिन बच्चों का कोमल मन अब- वे ही परायेपन से देखते हैं कैसे ’हँसमुख दम्पति’ अपनी लाचारी पर हँसते हैं अकेलेपन की खिड़की से उदासी सूरज की तकते हैं। #अनुभूति_गुप्ता
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जान लेनी थी साफ़ कह देते क्या ज़रूरत थी मुस्कुराने की ~अज्ञात
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हँसना चाहती हूँ मैं भी, बिना किसी रोक-टोक के सुनना चाहती हूँ मैं भी, सागर का कलरव नदियों की कल-कल ध्वनि चिड़ियों का चहचहाना हवाओं की ’साँय-साँय’... #अनुभूति_गुप्ता #जन्मदिन🎂💐
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मुझे रात पसंद है पर होनी चाहिए वो तारों भरी बात सुनना चाहती हूँ पर कहना भी चाहती हूँ खरी-खरी आदमी-आदमी को चाहे फिर रटे न रटे चाहे हरी-हरी सब कहते हैं वह, खुश है फिर उसकी आँखें क्यों रहती हैं भरी-भरी... #पद्मजा_शर्मा #जन्मदिन🎂💐
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