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कुलभूषण दीप

@कुलभूषण

कांटे कुछ कम ही कर गए निकले जिधर से हम

थोड़ा बहुत लिखता हूं 4 किताब छपी,,लेखक नहीं हूं रक्तदान जीवन का धर्म रहा १४५ बार किया कैंसर से युद्ध हुआ बचा,और सबको प्रेरित किया कैंसर पीड़ितों के लिए समर्पित

calender Aug 2020 में कू पर आए।

कू (194)
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कांटे कुछ कम ही कर गए निकले जिधर से हम
आंखे भरी हुई रो देने को तैयार खड़ी मन ने रोक लिया बोला तुम बस चुपचाप मुझे देखती रहना तेरा रोना सब देखेंगे मैं ही रो लेता हूं बस तुम ही देखना कौन किसी की पीड़ा को रोता होता है संग रोने वाला अपनी पीड़ा रोता है आंखों ने हामी तो भर ली आंखो की नमी दिल के रोने की व्यथा कथा कह गई
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कांटे कुछ कम ही कर गए निकले जिधर से हम
मेरे नाना *थे* कहना उचित नहीं होगा क्योंकि उनकी बहुत सी अमानतें मैं संभाले हुए हूं मेरे best friend, mere critic mere guide,teacher जाने क्या,क्या वो शायद मुझे बचपने में जान गए होंगे उस उम्र में ना कोई समझ मुझे शाम को घुमाने ले जाते तो हमेशा एक ही लाइन सुनाते वो सब मुझे याद रहीं उनके मतलब सालों बाद समझ आए आप सब के साथ साझा करता हूं वो मुश्किलें देता है,,. . . मुश्किल कुशा भी वोही 🥰🥰🥰
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कांटे कुछ कम ही कर गए निकले जिधर से हम
वो किसके स्वर थे? १७ _१२_१९९७ रात्रि के दूसरे पहर में, कम्बल ओढ़ टैरेस पे कुर्सी पे बैठा खुद से लड़ रहा, पत्नी कैंसर से अपना जीवन बचाने को संघर्षरत, तीसरी कीमो १९ को निश्चित मगर पास कुछ था नहीं झगड़ा अपने मित्र कृष्ण* से कुछ समय बीता आवाज़ सुनाई स्पष्ट सुबह का इंतजार कर ज़ोर से हस दिया, वहीं सो गया सुबह एक भुला बिसरा दोस्त आया कुछ बातें की एक पैकेट थमा गया खोला तो तीन लाख रुपए *कृष्ण*
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कांटे कुछ कम ही कर गए निकले जिधर से हम
मिट्टी खुदी, गारा हुई सांचों में ढली भट्ठी में तपी तब ईंट बन घर की दीवारें, घर आंगन ईंटों ने मज़बूत किए हम सब कितने खुश हुए जब ये ईंट भट्ठी में तप रही थी कितने सांसों का पसीना इसमें मिला कितनी बेबसी इस गारे में घुली थी कितनी किसकी मेहनत ने मिट्टी को ईंट होने तक के सफर में कितने बचपन प्रौढ हो गए किस किस की भूख़ के आंसू इसमें मिले तब कहीं जा ईंट का निर्माण हुआ वो मज़दूर बेघर है अभी तक
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कांटे कुछ कम ही कर गए निकले जिधर से हम
वो एक ठहर हुआ पल कड़ाके की ठंड थी बाहर ज़बरदस्त उथल पुथल भीतर उठा पटक ख्यालों की चली कुश्ती स्वालों की और मैं तन्हा खुद से भी दूर इतना तन्हा कि ऐसा लगा मेरा सिर ही मेरे कांधों पे नहीं है मैं इतना तन्हा खुद से भी अजनबी हूं उथल पुथल रुकी, कुश्ती थमी खिड़की पे ढेर सी ओस थमी दिल की आंखों खुली सुनहली रौशनी खिली आंखों को दिखा नहीं कुछ बस महसूस हुआ जिसे पुकारता हूं मानो सामने खड़ा
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कांटे कुछ कम ही कर गए निकले जिधर से हम
क्या मांगू कोई चाह नहीं है जो चाह है,कह देता हूं तुम सब जानते हो मुझे चाहिए अपने स्पर्श में स्नेह स्पंदन अपने श्वासों में तेरा वंदन अपनी वाणी में मिठास मुझे चाहिए वो सामर्थ्य जो किसी की भी पीड़ा सोख लें सामर्थ्य जो किसी अंधेरे को भी प्रकाशित कर दे मुझे चाहिए वो सहनशीलता राहों में बिखरे कांटे चुन पाऊं किसी के भी दुख में उसके थोड़े से सुख का कारण हो पाऊं मुझे देना तो यही देना तुम दाता हो ना
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कांटे कुछ कम ही कर गए निकले जिधर से हम
खामोश इमारत पार्ट १
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कांटे कुछ कम ही कर गए निकले जिधर से हम
खामोश इमारत पार्ट २
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कांटे कुछ कम ही कर गए निकले जिधर से हम
@aditi0312 जन्मदिन है मील पत्थर मुड़ के बस देखना भर जो बीता वो इतिहास हुआ बस आज में विश्वास कर स्नेह ह्रदय से देता तुम्हे स्नेह को स्वीकार कर रचता, लिखता जो भी ईश्वर मैं गीत उसी का गाता हूं स्नेह ना होगा अंश मात्र कम रौशनी से भरे तेरा जीवन यही प्रार्थना नित दिन दोहराऊंगा जब तक श्वास चल रहे स्नेह तुझे दे पाऊं मैं🥰🥰🥰
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कांटे कुछ कम ही कर गए निकले जिधर से हम
मेरे अध्यापक ने दी मुझे अनोखी सज़ा ४०० शब्दों में नहीं आ पायेगी संलग्न चित्र में है ये अध्यापक मेरे आठवीं क्लास के थे कुछ कुछ अरुणेश जी जैसे दिखते हैं मैं ग्रोवर सर को अरुणेश सर को इसीलिए प्रतिदिन प्रणाम करता हूं
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