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अरुणेश मिश्र

@अरुणेश_मिश्र

प्राचार्य , साहित्यकार

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प्राचार्य , साहित्यकार
रात को थकान है फिर भी मुस्कान है । अपने सब जीत गए मठाधीश रीत गए । मतगणना जारी है कुछ पर तो भारी है कुछ पर आभारी है । - अरुणेश मिश्र
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प्राचार्य , साहित्यकार
बांटते रहे सारे सपने जो जिसके थे वह उसे दिए । भावों को भावकलश में रख हम कभी व्यथित या कभी जिये । तुमने उन कलशों को देखा कुछ मुस्काईं कुछ शरमाईं । खुद चलीं गयीं हंसते गाते मेरे हिस्से में परछाईं । - अरुणेश मिश्र
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भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के जन्मदिवस/अधिवक्ता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें। शत शत नमन !
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प्राचार्य , साहित्यकार
झूठ बोलने का लाभ यहां मिलता है - गीता या कुरान पर हाथ रखकर संविधान की शपथ खाकर शपथ पत्र ( एफिडेविट ) में यही धड़ाधड़ झूठ बोलने का राजमार्ग है विधि संगत है जिसे कथित समझदार अपना रहे हैं तीन के तेरह बना रहे हैं । - अरुणेश मिश्र
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प्राचार्य , साहित्यकार
व्यंग्य लिखते समय दिगम्बर जूते न मारें , खून निकल आएगा । भिगोकर मारना एक साहित्यिक व सांस्कृतिक उपलब्धि है । - अरुणेश मिश्र
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प्राचार्य , साहित्यकार
💐💐 जय श्रीराधे राधे💐💐
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प्राचार्य , साहित्यकार
शब्दजाल ही आज की राजनीति है । झूठम वद चरित्रहीनता की हद उपलब्धियों में भद उच्चतम पद वाह ! वाह ! नारायणी प्रशस्ति नरभक्षी कद । -अरुणेश मिश्र
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प्राचार्य , साहित्यकार
पुण्य क्या है ? पाप क्या है ? सृष्टि में अभिशाप क्या है ? शोक या अनुताप क्या है ? दुःख या संताप क्या है ? 💐कौन इसको जान पाया ? 💐 कब , कहाँ पहचान पाया ? लोभ है तो पाप भी है । सृष्टि में संताप ही है । शोक में करुणा निहित है यही सत है यही चित है पुण्य है साभार रहना प्राणियों में प्यार रहना सत्य अपरम्पार रहना कार्य में उपकार रहना । जो इसे है जान पाया । वही युगचेता हुआ है । अरुणेश मिश्र
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प्राचार्य , साहित्यकार
हमने जब तुमको पढ़ा नही कैसा लिखतीं , कैसा दिखतीं ? हमने जब भाव नही जाने किन भावों में निशिदिन सजतीं । कैसे कह दें - दुष्यंत यहां प्रेमी कैसा ? क्या शकुंतला ? जब एक अंगूठी के कारण प्रिय शकुन्तला को छोड़ चला । - अरुणेश मिश्र
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प्राचार्य , साहित्यकार
यह चन्दन चन्दन सी सुगन्ध ऊपर से हंसती मंद मंद । प्रतिबन्ध हो गए सभी अंध खुल गए नदी के सभी बन्ध । कल कल कल कल पावन पावन रूपसि ! कितनी हो मनभावन । सारी ऋतुएं अंगों में भर विह्वल कर देतीं उर , तन , मन । - अरुणेश मिश्र
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