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backKoo - Swati SharmaGo to Feed
राजनीति कि ऐसी चादर ओढ़ ली है समाज ने कि उढने बेढने खाने पिने मे भी होने लगी है साजिशें इतना रग क्या चढ़ा लिया अपना ही वजूद गवा लिया पहले जो बातें होती थी चाये के खोखे में आज कल होने लगी व्हट्सएप्प फेसबुक के हर कौने में राजनीति ने घर तोडे हर सरहद मे दिवार की ये देश रहा है उसमे भी अब दरार की सोचा था सकूं का कुछ पल कू के साथ बिताऊगी पर यहां भी लोगों ने आलोचना की जगह बना ल
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जिस देश के सारे अधिकारी सारे उच पद के अफसर पढे लिखे होने चाहिए ।जो इमानदारी कि मिसाल कायम करे ।जो नियम के पके हो उसी देश के नेत अनपढ ।चोर ।खुनी खोटाले बाज ।करपट ।होते है पता धही कौन लोग है जो इस त के लोग को वोट भी देकर हमारे सर पर बिठा देते है अपने छोटे से काम निकलवाने के लिये ये लो देश के भव केसाथसौदाकरते है खुद सोचो कि देश क भवि कैसा होग ।कया उममिद करते हे हम नेत बाद मे बदलेगा पहले हमजनता बदलै
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अब तो इतजार है उस उम् का जब दोनो बैठे याद करेगे गुजरे हर लमहे का न होगा कोई जिममेदारी का बोझ न होगा किसी बात का शोर मेर तेरा वकत होगा वो कागज मुड क एक होगा
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पति पत्नी एक ही कागज के दो पहलू जिनका सफर शुरु तो कोरे कागज हुआ पर लिखते लिखते इक हसीन सफर बन गया पहलू के एक तरफ पति के जजबात जिमेदारीया ओर वो अधूरे शबद जिस को वो कह न पाया रूठ कर मनाना जिसे कभी न आया पहलू के दूसरी तरफ पत्नी के भाव समझोता झुकना जिसकी अपनी कहानी दोनो कहने को तो है साथ मगर रहते खुद से ही दूर है खुद कोई झगडा नही पर नराज होते वो जरूर है
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मुझे आज कू की तरफ से मश्ग आया ।की में १९९७फॉलोअर को गए कुक कहु की मु कसी लगा। मैं सब का शुक्रिया करुगी की आप सब न मेरी लेखनी को पैसे की जिस जिससे हौसला मिल है।
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यारों की यारिया वो पल याद आत है आज भी मुज दोस्तो पुराने दिन याद आत है वो जो भोलापन था सब मे मिलकर है पल भर जीने का आज कल की भागदौड़ ने सब कुछ ही छीन लिया भोलेपन मैं को जवानी आई जेमेदारियो ने फिर जगा बनाई सब कुछ करने मैं खुद को यू वेस्ट किया उम्र के तीसरे पहर मैं किस को पड़ी है आज कौन किस हाल मैं है सालो बाद मिलने पर भी जो न करे गिला शिकवा दोस्त आज भी न बदल रिश्ता
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दोस्ती हर एक की जिंदगी का खास रिश्ता बचपन का भोलापन जवानी का जोश युवा का साथ बुढ़ापे मे राज हर रंग मे होता है दोस्ती का रिश्ता ख़ास
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मेरा तो सपना था खुद का एक घर हो जहां चाय की चुस्की लेते सकूं के कुछ पल हो न बहुत ख्वाहिशें थी शुरू से मेरी न झुठी उम्मीद का कोई जाल हो मगर तुम ने दिला कर के मकान। अरमान सारे मार दिये खाली कर इस दिल को तुम इस जहां को खनडर बना गये
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ना जाने कब वो समझेंगे मेरे भी जस्बातो को सुने को बस एक ही बात मेरा दिल भी है बेताब कमाने वाली बिवी जो आई भूल गये सब घर में बहू भी है आई मेरे भी अरमान सब यू ही अधुरे रह गये लगता है अब इस घर मे दो मर्द ही बस रह गये
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मुझसे जिंदगी ने कुछ पल उधार मांगे मैंने हस के इक उम्र देदी तूने अहसान भी न माना लिखके मुझे जुदाई देदी
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