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सुनो ना..... काश जिंदगी सचमुच किताब होती पढ़ सकती मैं की आगे क्या होगा ? क्या पाऊँगी मैं, और क्या दिल खोएगा ? कब थोड़ी ख़ुशी मिलेगी, कब दिल रोएगा ? काश जिंदगी सचमुच किताब होती, फाड़ सकती मैं उन लम्हों को जिन्होंने मुझे रुलाया हैं... हिसाब तो लगा पाती कितना खोया और कितना पाया हैं ? काश जिंदगी सचमुच किताब होती वक़्त से आँखे चुराकर पीछे चली जाती ... टूटे सपनों को फिर से अरमान
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