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इस संसार में जो पुरुष आशा के दास हो रहे हैं अर्थात् जिन्होंने स्त्री पुत्र धनादिकों की प्राप्ति की और विकाळ तक जीनेकी आशा लगाई है उनको सभी लोगों का दास ही होना पडता है... और आशा को जिन्होंने अपनी दासी बना लिया है संपूर्ण जगत् उनका दास बन गया है ॥१॥ उसी पुरुष ने संपूर्ण शास्त्रों का अध्ययन कर लिया है... और उसी ने सवशास्त्र का श्रवण भी किया जिसने आशा को पीछे हटाकर निराशता को अंगीकार कर लिया है ॥२ ॥
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