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हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके, तुम ने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके। तुम ही न सुन सके अगर क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन, किस की ज़बाँ खुलेगी फिर हम न अगर सुना सके। ~ हफ़ीज़ जालंधरी स्वर: जगजीत सिंह और चित्रा सिंह https://youtu.be/mkrMTA8L_-U
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