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स्त्री की मांग मे जब सिंदूर भर दी जाती तो जिन्दगी भी बदल जाती मां_बाप का प्रेम आंगन सब_कुछ छुट जाता है दबी-दबी सी ख्वाईशे सिमट जाती न बचपन रह जाता_न ही शरारते काश_समझ पाते वो जिन्हे मुझे ताउम्र समझना झूर्रियो मे भी हाथ थामे अंतिम साँसो तक चलना मै ठहरी #स्त्री हर बात कहाँ कह पाती हूँ तुम तो देव हो ना मेरे फिर खामोशियां क्यूँ न पढ़ी जाती बस कुछ न चाहत हमे थोड़ा सा प्यार दे जाओ कभी पास बैठ दर्द पूछ लो
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Replying to @DrGudiyaa
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