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हार रही हैँ, जिंदगानियाँ, बेवस हो चला इंसान हैँ कही एक तरफ खामोशियाँ तो कहीं चितत्कार हैं,! अटहास करता कोरोना तो सहमा रहा मानव हैं | खाली गलिआ,सूने आंगन उदास होते स्वर गुंजन | ऊपर श्रीतिज़ सा सूना नभ मण्डल तो नीचे शोक वेश मे धारित रक्तरंजित धरा हैं , मरुस्थल सी बनी भूमि मे फैली चिताओं की ऊँची तपिशे | खो रहे अपने हैं और व्याकुल होता चित्त हैं, नयनों मे अश्रो का उमड़ता सैलाब कहीं ,
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Replying to @richa_tiwari
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