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पति पत्नी एक ही कागज के दो पहलू जिनका सफर शुरु तो कोरे कागज हुआ पर लिखते लिखते इक हसीन सफर बन गया पहलू के एक तरफ पति के जजबात जिमेदारीया ओर वो अधूरे शबद जिस को वो कह न पाया रूठ कर मनाना जिसे कभी न आया पहलू के दूसरी तरफ पत्नी के भाव समझोता झुकना जिसकी अपनी कहानी दोनो कहने को तो है साथ मगर रहते खुद से ही दूर है खुद कोई झगडा नही पर नराज होते वो जरूर है
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