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*लचीला पेड़ था जो झेल गया आँधियाँ,* _*मैं मग़रूर दरख़्तों का हश्र जानता हूँ।* *कुछ पाया पर अपना कुछ नहीं माना,* _*क्योंकि आख़िरी ठिकाना मेरा मिट्टी का घर जानता हूँ।* *🙏🌹भैया दूज की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं🌹🙏*
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